Sunday, October 04, 2015

शाप मुक्ति।

शाप मुक्ति।
त्रेता युग के दौरान भगवान श्रीराम ने अश्वमेघ यज्ञ के लिए भगवान रघुनाथ की इस मूर्ति को अपने हाथों से बनाया था। यज्ञ पूरा होने पर इसे श्रीराम ने अपने राज्य में ही स्‍थापित किया था। मगर कुल्‍लवी राजा अपने पाप धोने के लिए इसे हिमाचल ले आया था। ये कहानी राजा जगत सिंह से जुड़ी है जिसने अपने अहंकार में एक बड़ा पाप कर दिया था। इसके बदले उसे ऐसा खौफनाक शाप मिला था कि उसका जीना मुश्किल हो गया था। कहा जाता है कि 17वीं शताब्दी में कुल्‍लू में राजा जगत सिंह का राज था। एक दिन उसे सूचना मिली कि गांव के एक पंडित दुर्गादत्त को घाटी में काम करते वक्त कुछ हीरे मोती मिले हैं। राजा उसे पाना चाहता था। अहंकार में आकर उसने इन्हें पाने की ठान ली। राजा ने सैनिकों को आदेश दिए कि दुर्गादत्त से सारे मोती छीनकर खजाने में जमा किए जाएं। सैनिक भी चले गए और दुर्गादत्त को खूब मारा पीटा लेकिन हीरे मोती नहीं मिले। उसे आए दिन सबके सामने सजा दी जाने लगी।ऐसा माना जाता है कि शायद दुर्गादत्त के पास ज्ञान के अलावा और कुछ नहीं था। जब राजा का जुल्म हद से बढ़ गया तो दुर्गादत्त ने खुद को परिवार सहित अपने घर में बंद कर लिया। इसके बाद उसने घर को आग लगा दी और खुद भी परिवार सहित जल गया। मरने से पहले दुर्गादत्त ने राजा को शाप दिया था कि जब भी राजा चावल खाएगा तो उसे चावल के दानों की जगह कीड़े दिखाई देंगे। वहीं पीने का पानी खून बन जाएगा। बाद में शाप का असर दिखने लगा और राजा का खाना पीना मुश्किल हो गया। राजा बहुत दुखी हुआ। उसका अहंकार टूट चुका था। शाप के डर से वह एक संत के पास गया जहां संत ने कहा कि उसे अपने राज्य में भगवान रघुनाथ का मंदिर बनवाना होगा। इसके लिए अयोध्या से मूर्ति लानी होगी। राजा ने ऐसा ही किया और अयोध्या से श्रीराम की बनाई भगवान रघुनाथ की मूर्ति लाकर कुल्‍लू में भव्य मंदिर बनवा दिया। इसके बाद घाटी में समृद्घि लौटने लगी। राजा ने अपना राज्य भगवान रघुनाथ को सौंप दिया। इसी के बाद ऐतिहासिक दशहरा मनाया जाने लगा। घाटी में भगवान रघुनाथ सबसे बड़े देवता हैं और हजारों देवता उनके आगे शीश झुकाते हैं।कहते हैं भगवान रघुनाथ सबसे अमीर देवताओं में से एक है। घाटी के लोग आज भी प्राकृतिक आपदा के समय अपने ईष्ट देव की पूजा अर्चना करते हैं। देवता उनकी सारी मन्नतें पूरी भी करते हैं।

Saturday, October 03, 2015

सूर्य मंदिर।

सूर्य मंदिर।
भारत के पूर्वी समुद्री तट पर कोणार्क सूर्य मंदिर का निर्माण पूर्वी गंगा साम्राज्य के राजा नर्सिम्देव प्रथम ने तेरहवीं सदी में तत्कालीन समय के अनुसार लगभग 40 करोड़ स्वर्ण मुद्राओं की लागत से करवाया था। आठ सौ वर्ष पूर्व की भारतीय निर्माण शास्त्र की अदभुद शैली एवं विज्ञान को देख कर अचंभित होना स्वभाविक है। वहां के कुछ उन्नत निर्माण शौली का विवरण ये रहा-

सम्पूर्ण ढाँचे को बड़े बड़े पत्थरों से बनाया गया है। इन पत्थरो के बीच किसी भी तरह का चुना प्रयोग नहीं किया गया था, अपितु पत्थरों को जोड़ने के लिए बड़ी बड़ी कीलों को क्लैम्पिग किया गया था। यहाँ सूर्य देव के सिंघासन और चक्रों के बीच कीलें स्पष्ट दिखाई दे रही हैं। छतों का भार सहने के लिए बड़ी बड़ी लौह बीम का इस्तेमाल हुआ है। यह बीम आज भी जंक रहित हैं। मन्दिर में अनेक चुम्बक लगी हुई थीं, जिनमे दो अत्यधिक शक्तिशाली चुम्बक मन्दिर के उपर और नीचे लगाई गयीं थीं। सम्पूर्ण स्ट्रक्चर जो लोहे की कील और बीम से जकड़ा गया था, वह सब चुम्बकीय शक्ति से दृण और स्थिर था। यहाँ सूर्य सिंघासन पर एक धातु की सूर्य प्रतिमा थी जो दो चुम्बकों की शक्ति के द्वारा हवा में स्थिर थी। हम सब ने प्रायः भूमि पर हॉरिजॉन्टल सोलर क्लॉक देखा/ सुना है, लेकिन सूर्य मंदिर के रथ का प्रत्येक पहिया एक सोलर क्लॉक है जो कुछ मिनट के एरर से एकदम सटीक समय बताता है।

सत्रवीं शताब्दी में जब भारत के पूर्वी तट पर पुर्तगालियों का आगमन हुआ तो मंदिर की शक्तिशाली चुम्बक द्वारा उनके मैग्नेटिक कम्पास डिस्टर्ब होने के कारण वह भटक जाया करते थे। तब पुर्तगालियों ने मंदिर की मैगनेट को नष्ट कर दिया। चूँकि मैगनेट के द्वारा मंदिर का ढांचा स्थिर था, मैगनेट नष्ट होने के बाद ढांचा कमजोर हो गया और धीरे धीरे गिरने लगा। अपने देश में एक झोपडी भी बनाने की औकात न रखने वाले पश्चिमी एशियाई आक्रमणकारी यहाँ बड़े बड़े ताज महल बनाने का दावा कर गए। कभी किसी पुरातत्वविद से बात कीजिये, पता चलेगा की कैसे यहीं की निर्माण शैली को अपना नाम देकर इतिहास गुमराह कर दिया गया है। और यदि सही से शोध किया जाए तो न जाने कितने ही ताज महल यहाँ तेजो महालय निकलेंगे।

Thursday, October 01, 2015

जीण माता।

जीण माता।
राजस्थान के सीकर जिले में स्थित धार्मिक महत्त्व का एक गाँव है। यह सीकर से २९ किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। यहाँ की कुल जनसंख्या ४३५९ है। यहाँ पर जीणमाता का एक प्राचीन मन्दिर स्थित है। जीणमाता का यह पवित्र मंदिर सैकड़ों वर्ष पुराना माना जाता है। लोक मान्यताओं के अनुसार जीण का जन्म चौहान वंश के राजपूत परिवार में हुआ। उनके भाई का नाम हर्ष था जो बहुत खुशी से रहते थे। एक बार जीण का अपनी भाभी के साथ विवाद हो गया और इसी विवाद के चलते जीण और हर्ष में नाराजगी हो गयी। हर्ष अपनी बहन की नाराजगी को दूर करने उन्हें मनाने काजल शिखर पर पहुंचे और अपनी बहन को घर चलने के लिए कहा लेकिन जीण माता ने घर जाने से मना कर दिया। बहन को वहां पर देख हर्ष भी पहाड़ी पर तप भैरो की तपस्या करने लगा और उसने भैरो पद प्राप्त कर लिया। माता आज भी प्रसाद के रूप में शराब का सेवन करती है।

यह मंदिर चूना पत्थर और संगमरमर से बना हुआ है। यह मंदिर आठवीं सदी में निर्मित हुआ था। लोक मान्यता के अनुसार एक बार मुगलों के बादशाह औरंगजेब ने जीण माता और भैरो के मंदिर को तोडऩे के लिए अपने सैनिकों को भेजा। जीण माता और भैरो के मंदिर को तोडऩे के बारे में जब लोगों को पता चला तो वह बहुत दुखी हुए। बादशाह के इस व्यवहार से दुखी होकर लोग जीण माता की प्रार्थना करने लगे। जीण माता ने अपना चमत्कार दिखाया और वहां पर मधुमक्खियों के एक झुंड ने मुगल सेना पर धावा बोल दिया। मधुमक्खियों के झुंड ने जैसे ही मुगल सेना पर धावा बोला सभी सैनिक वहां से भाग गए, और दूसरी तरफ औरंगजेब भी गंभीर रुप से बीमार हो गया। औरंगजेब ने माता के मंदिर में आकर अपनी गलती की मांफी मांगी और माता को वचन दिया कि वह हर महीने सवा मण अखंड तेल दीप के लिए भेंट करेगा। इसके बाद औरंगजेब की तबीयत में सुधार होने लगा। पहले शासन व्यवस्था करता था, आज भक्तो के द्वारा सुव्यवस्था है।

ओरंगजेब द्वारा किये गए विध्वंस के चिन्ह आज भी दूर दूर तक बिखरे हुए हैं। प्रस्तर पर उकेरे अनुपम पौराणिक आख्यान, अदभुत पुरातात्विक कलाकृतियाँ - जिसमें ना जाने कितने कलाकारों का अमूल्य परिश्रम लगा होगा आज धूल धूसरित खंडित जहां तहां बिखरे पड़े हैं। पुराने शिव मंदिर के स्थान पर नवीन मंदिर निर्माण हो चुका है, किन्तु खंडित ध्वंसावशेष बता रहे हैं कि पुराने मंदिर से उसकी कोई तुलना नहीं हो सकती। संगमरमर का विशाल शिव लिंग तथा नंदी प्रतिमा आकर्षक है। पराशर ब्राह्मण वंश परंपरा से उनकी सेवा पूजा में नियुक्त हैं। पास ही हर्षनाथ का मंदिर है जहां चामुंडा देवी तथा भैरव नाथ के साथ उनकी दिव्य प्रतिमाये स्थित हैं। सेकड़ों के तादाद में काले मुंह के लंगूर मंदिर पर चढ़ाए जाने वाले प्रसाद के पहले अधिकारी हैं। कोई आनाकानी करे तो वे जबरन लेने में संकोच नहीं करते।

Monday, September 28, 2015

श्राद्ध प्रक्रिया।

श्राद्ध प्रक्रिया।
1. श्राद्ध क्या है?
श्राद्ध प्रथा वैदिक काल के बाद शुरू हुई। और इसके
मूल में उपरोक्त श्लोक की भावना है। उचित समय
पर शास्त्रसम्मत विधि द्वारा पितरों के लिए
श्रद्धा भाव से मंत्रों के साथ जो (दान-
दक्षिणा आदि) दिया जाए, वही श्राद्ध
कहलाता है।

2. श्राद्ध के मुख्य देवता कौन हैं?
वसु, रुद्र तथा आदित्य, ये श्राद्ध के देवता हैं।

3. श्राद्ध किसका किया जाता है? और क्यों?
हर मनुष्य के तीन पूर्वज : पिता, दादा और
परदादा क्रमश: वसु, रुद्र और आदित्य के समान
माने जाते हैं। श्राद्ध के वक्त वे ही सभी पूर्वजों के
प्रतिनिधि समझे जाते हैं। समझ जाता है, कि वे
श्राद्ध कराने वालों के शरीर में प्रवेश करते हैं। और
ठीक ढंग से किए श्राद्ध से तृप्त होकर वे अपने वंशधर
के सपरिवार सुख, समृद्धि और स्वास्थ्य का वरदान
देते हैं। श्राद्ध के बाद उस दौरान उच्चरित मंत्रों तथा
आहुतियों को वे सभी पितरों तक ले जाते हैं।

4. श्राद्ध कितनी तरह के होते हैं?
नित्य, नैमित्तिक और काम्य। नित्य श्राद्ध,
श्राद्ध के दिनों में मृतक के निधन की तिथि पर,
नैमित्तिक किसी विशेष पारिवारिक मौके (जैसे
पुत्र जन्म) पर और काम्य विशेष मनौती के लिए
कृत्तिका या रोहिणी नक्षत्र में
किया जाता है।

5. श्राद्ध कौन-कौन कर सकता है?
आमतौर पर पुत्र ही अपने पूर्वजों का श्राद्ध करते
पाए जाते हैं। लेकिन शास्त्रनुसार ऐसा हर
व्यक्ति जिसने मृतक की संपत्ति विरासत में पाई
है, उसका स्नेहवश श्राद्ध कर सकता है। यहाँ तक
कि विद्या की विरासत से लाभान्वित होने
वाला छात्र भी अपने दिवंगत गुरु का श्राद्ध कर
सकता है। पुत्र की अनुपस्थिति में पौत्र
या प्रपौत्र श्राद्ध करते हैं। निस्संतान
पत्नी को पति द्वारा, पिता द्वारा पुत्र
को और बड़े भाई द्वारा छोटे भाई को पिण्ड
नहीं दिया जा सकता। किन्तु कम उम्र
का ऐसा बच्च, जिसका उपनयन न हुआ हो,
पिता को जल देकर नवश्राद्ध कर सकता है। शेष
कार्य (पिण्डदान, अग्निहोम) उसकी ओर से कुल
पुरोहित करता है।

6. श्राद्ध के लिए उचित और वजिर्त पदार्थ क्या हैं?
श्राद्ध के लिए उचित द्रव्य हैं : तिल, माष, चावल,
जौ, जल, मूल (जड़युक्त सब्जी) और फल। तीन चीजें
शुद्धि कारक हैं : पुत्री का पुत्र, तिल और
नेपाली कम्बल! श्राद्ध करने में तीन बातें प्रशंसनीय
हैं : सफाई, क्रोधहीनता और चैन (त्वरा (शीघ्रता)
का न होना)। श्राद्ध में अत्यन्त महत्वपूर्ण बातें हैं :
अपरान्ह का समय, कुशा,
श्राद्धस्थली की स्वच्छता, उदारता से
भोजनादि की व्यवस्था और अच्छे
ब्राह्मणों की उपस्थिति।
कुछ अन्न और खाद्य पदार्थ जो श्राद्ध में
नहीं लगते, इस प्रकार हैं : मसूर, राजमा, कोदों,
चना, कपित्थ, अलसी (तीसी, सन, बासी भोजन
और समुद्र जल से बना नमक। भैंस, हरिणी, ऊँटनी, भेड़
और एक खुर वाले पशुओं का दूध भी वजिर्त है। पर भैंस
का घी वजिर्त नहीं। श्राद्ध में दूध, दही और
घी पितरों के लिए विशेष तुष्टिकारक माने गए हैं।

7. श्राद्ध में कुश तथा तिल का क्या महत्व है?
दर्भ या कुश को जल और वनस्पतियों का सार
माना गया है। माना यह भी जाता है कि कुश
और तिल दोनों विष्णु के शरीर से निकले हैं। गरुड़
पुराण के अनुसार, तीनों देवता ब्रह्मा-विष्णु-महेश
कुश में क्रमश: जड़, मध्य और अग्रभाग में रहते हैं। कुश
का अग्रभाग देवताओं का, मध्य मनुष्यों का और
जड़ पितरों का माना जाता है। तिल
पितरों को प्रिय और दुष्टात्माओं को दूर भगाने
वाले माने जाते हैं। माना गया है
कि बिना तिल बिखेरे श्राद्ध किया जाए,
तो दुष्टात्माएँ हवि उठा ले जाती हैं।

8. दरिद्र व्यक्ति श्राद्ध कम खर्चे में कैसे करे?
विष्णु पुराण के अनुसार दरिद्र लोग केवल
मोटा अन्न, जंगली साग-पात-फल और न्यूनतम
दक्षिणा, वह भी न हो तो सात या आठ तिल
अंजलि में जल के साथ लेकर ब्राह्मण को दे दें।
या किसी गाय को दिनभर घास खिला दें।
अन्यथा हाथ उठाकर दिक्पालों और सूर्य से
याचना करें कि मैंने हाथ वायु में फैला दिए हैं, मेरे
पितर मेरी भक्ति से संतुष्ट हों।

9. पिण्ड क्या हैं? उनका अर्थ क्या है?
श्राद्ध के दौरान पके हुए चावल दूध और तिल
मिश्रित जो पिण्ड बनाते हैं, उसे सपिण्डीकरण
कहते हैं। पिण्ड का अर्थ है शरीर। यह एक पारंपरिक
विश्वास है, जिसे विज्ञान भी मानता है, कि हर
पीढ़ी के भीतर मातृकुल तथा पितृकुल दोनों में
पहले की पीढ़ियों के समन्वित गुणसूत्र मौजूद होते
हैं। चावल के पिण्ड जो पिता, दादा और
परदादा तथा पितामह के शरीरों का प्रतीक हैं,
आपस में मिलाकर फिर अलग बाँटते हैं। यह
प्रतीकात्मक अनुष्ठान जिन-जिन लोगों के
गुणसूत्र (जीन्स) श्राद्ध करने वाले की अपनी देह में
हैं, उनकी तृप्ति के लिए होता है। इस पिण्ड
को गाय-कौओं को देने से पहले पिण्डदान करने
वाला सूँघता भी है। अपने
यहां सूँघना यानी आधा भोजन
करना माना गया है। इस तरह श्राद्ध करने
वाला पिण्डदान के पहले अपने
पितरों की उपस्थिति को खुद अपने भीतर
भी ग्रहण करता है।

10. इस पूरे अनुष्ठान का अर्थ क्या है?
अपने दिवंगत बुजुर्गो को हम दो तरह से याद करते
हैं : स्थूल शरीर के रूप में और भावनात्मक रूप से! स्थूल
शरीर तो मरने के बाद अग्नि या जलप्रवाह को भेंट
कर देते हैं, इसलिए श्राद्ध करते समय हम
पितरों की स्मृति उनके ‘भावना शरीर’
की पूजा करते हैं ताकि वे तृप्त हों, और हमें
सपरिवार अपना स्नेहपूर्ण आशीर्वाद दें।

Sunday, September 27, 2015

स्यमन्तक मणि।



स्यमन्तक मणि।
भगवान कृष्ण और जामवंत में क्यों हुआ 28 दिनों तक युद्ध?
एक थे राजा सत्राजित जिन्होने सूर्य की तपस्या कर स्यमन्तक नाम की मणि पाई (वह मणि रोजाना 8 भरी सोना देती थी साथ ही जिस स्थान में वह मणि होती थी वहाँ के सारे कष्ट स्वयं ही दूर हो जाते थे), एक दिन जब कृष्ण खेल रहे थे तो सत्राजित मणि सर पर लगा उनसे मिलने पहुंचे जिसे देख कृष्ण ने कहा की इस मणि के अधिकारी तो राजा उग्रसेन जी है। बात सुन सत्राजित बिना कुछ बोले ही वहाँ से उठ कर चले गए, मणि को अपने घर के मन्दिर में स्थापित कर दिया। एक दिन राजा का भाई स्यमन्तक को पहन कर घोड़े पर सवार हो शिकार पे निकला जन्हा एक सिंह ने उसे मार गिराया। मणि भी उसके पेट में चली गई जिसे ऋक्षराज जामवंत ने मारा और वह मणि पाली और अपनी गुफा में चला गया। जामवंत ने उस मणि को अपने बालक को दे दिया जो उसे खिलौना समझ उससे खेलने लगा।

भाई के गायब होने पर राजा ने बिना सोचे कृष्ण जी पर हत्या और चोरी के आरोप फैला दिए। आरोप झुटलाने के लिए श्री कृष्ण वन में गए जन्हा उन्होंने घोड़ा सहित प्रसेनजित को मरा हुआ देखा पर मणि नहीं दिखी। निकट ही सिंह के पंजों के चिन्ह थे, जिनके सहारे आगे बढ़ने पर उन्हें मरे हुए सिंह का शरीर मिला। वहाँ पर रीछ के पैरों के पद-चिन्ह भी मिले जो कि एक गुफा तक गये थे। जब वे उस भयंकर गुफा के निकट पहुँचे तब श्री कृष्ण ने यादवों से कहा कि तुम लोग यहीं रुको। मैं इस गुफा में प्रवेश कर मणि ले जाने वाले का पता लगाता हूँ। इतना कहकर वे सभी यादवों को गुफा के मुख पर छोड़ उस गुफा के भीतर चले गये।वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि वह मणि एक रीछ के बालक के पास है जो उसे हाथ में लिए खेल रहा था। श्री कृष्ण ने उस मणि को उठा लिया। यह देख कर जामवंत अत्यन्त क्रोधित होकर श्री कृष्ण को मारने के लिये झपटा। जामवंत और श्री कृष्ण में भयंकर युद्ध होने लगा। जब कृष्ण गुफा से वापस नहीं लौटे तो सारे यादव उन्हें मरा हुआ समझ कर बारह दिन के उपरांत वहाँ से द्वारिकापुरी वापस आ गये तथा समस्त वृतांत वासुदेव और देवकी से कहा। वासुदेव और देवकी व्याकुल होकर महामाया दुर्गा की उपासना करने लगे। उनकी उपासना से प्रसन्न होकर देवी दुर्गा ने प्रकट होकर उन्हें आशीर्वाद दिया कि तुम्हारा पुत्र तुम्हें अवश्य मिलेगा।

श्री कृष्ण और जामवंत दोनों ही पराक्रमी थे। युद्ध करते हुये गुफा में अट्ठाईस दिन बीत गए। कृष्ण की मार से महाबली जामवंत की नस टूट गई। वह अति व्याकुल हो उठा और अपने स्वामी श्री रामचन्द्र जी का स्मरण करने लगा। जामवंत के द्वारा श्री राम के स्मरण करते ही भगवान श्री कृष्ण ने श्री रामचन्द्र के रूप में उसे दर्शन दिये। जामवंत उनके चरणों में गिर गया और अपने कर्मो की क्षमा मांगी. तब कृष्ण ने उनसे कहा की रामअवतार के समय रावण के वध हो जाने के पश्चात मुझसे युद्ध करने की इच्छा व्यक्त की जो की मेने अगले अवतार में पूरी करने का वर दिया था. अपना कथन पूरा करने रघुवंशी अगला जन्म लेके आया है. जामवंत ने भगवान श्री कृष्ण से अपनी कन्या जामवंती का विवाह कर दिया।

कृष्ण द्वारका पहुँचे तो सत्राजित को बुलवा कर उसकी स्यमन्तक मणि उसे लौटा दी, अपने द्वारा लगाये गये कलंक के कारण शर्मिंदा राजा ने अपनी कन्या सत्य-भामा का विवाह श्री कृष्ण के साथ कर दिया और वह मणि भी उन्हें दहेज में दे दी। किन्तु कृष्ण ने उस मणि को स्वीकार न करके सत्राजित को वापस कर दिया।

Friday, September 25, 2015

वामनावतार।



वामनावतार।
वामन विष्णु के पाँचवे तथा त्रेता युग के पहले अवतार थे। इसके साथ ही यह विष्णु के पहले ऐसे अवतार थे जो मानव रूप में प्रकट हुए — अलबत्ता बौने ब्राह्मण के रूप में। इनको दक्षिण भारत में उपेन्द्र के नाम से भी जाना जाता है। वामन ॠषि कश्यप तथा उनकी पत्नी अदिति के पुत्र थे। वह आदित्यों में बारहवें थे। ऐसी मान्यता है कि वह इन्द्र के छोटे भाई थे। भागवत कथा के अनुसार विष्णु ने इन्द्र का देवलोक में अधिकार पुनः स्थापित करने के लिए यह अवतार लिया। देवलोक असुर राजा बली ने हड़प लिया था। बली विरोचन के पुत्र तथा प्रह्लाद के पौत्र थे और एक दयालु असुर राजा के रूप में जाने जाते थे। यह भी कहा जाता है कि अपनी तपस्या तथा ताक़त के माध्यम से बली ने त्रिलोक पर आधिपत्य हासिल कर लिया था। वामन, एक बौने ब्राह्मण के वेष में बली के पास गये और उनसे अपने रहने के लिए तीन कदम के बराबर भूमि देने का आग्रह किया। उनके हाथ में एक लकड़ी का छाता था। गुरु शुक्राचार्य के चेताने के बावजूद बली ने वामन को वचन दे डाला। राजा बलि से भिक्षा माँगते वामनदेव वामन ने अपना आकार इतना बढ़ा लिया कि पहले ही कदम में पूरा भूलोक (पृथ्वी) नाप लिया। दूसरे कदम में देवलोक नाप लिया। इसके पश्चात् ब्रह्मा ने अपने कमण्डल के जल से वामन के पाँव धोये। इसी जल से गंगा उत्पन्न हुयीं। तीसरे कदम के लिए कोई भूमि बची ही नहीं। वचन के पक्के बली ने तब वामन को तीसरा कदम रखने के लिए अपना सिर प्रस्तुत कर दिया। वामन बली की वचनबद्धता से अति प्रसन्न हुये। चूँकि बली के दादा प्रह्लाद विष्णु के परम् भक्त थे, वामन (विष्णु) ने बाली को पाताल लोक देने का निश्चय किया और अपना तीसरा कदम बाली के सिर में रखा जिसके फलस्वरूप बली पाताल लोक में पहुँच गये।

एक और कथा के अनुसार वामन ने बली के सिर पर अपना पैर रखकर उनको अमरत्व प्रदान कर दिया। विष्णु अपने विराट रूप में प्रकट हुये और राजा को महाबली की उपाधि प्रदान की क्योंकि बली ने अपनी धर्मपरायणता तथा वचनबद्धता के कारण अपने आप को महात्मा साबित कर दिया था। विष्णु ने महाबली को आध्यात्मिक आकाश जाने की अनुमति दे दी जहाँ उनका अपने सद्गुणी दादा प्रहलाद तथा अन्य दैवीय आत्माओं से मिलना हुआ।

Wednesday, September 23, 2015

तेजाजी महाराज।


तेजाजी महाराज।
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को तेजा दशमी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन तेजाजी महाराज के मंदिरों पर मेला लगता है, जहां सर्पदंश से पीड़ित सहित अन्य जहरीले कीड़ों की ताँती (धागा) छोड़ा जाता है।

कथा
तेजाजी राजा बाक्साजी के पुत्र थे। बचपन में ही उनके साहसिक कारनामों से लोग आश्चर्यचकित रह जाते थे। एक बार अपने हाली (साथी) के साथ तेजा अपनी बहन पेमल को लेने उसकी ससुराल गए। बहन पेमल की ससुराल जाने पर वीर तेजा को पता चलता है कि मेणा नामक डाकू अपने साथियों के साथ पेमल की ससुराल की सारी गायों को लूट ले गया। वीर तेजा अपने साथी के साथ जंगल में मेणा डाकू से गायों को छुड़ाने के लिए गए। रास्ते में एक बांबी के पास भाषक नामक सांप घोड़े के सामने आ जाता है एवं तेजा को डसना चाहता था।

तब तेजा उसे वचन देते हैं कि अपनी बहन की गाएं छुड़ाने के बाद मैं वापस यहीं आऊंगा, तब मुझे डंस लेना। अपने वचन का पालन करने के लिए डाकू से अपनी बहन की गाएं छुड़ाने के बाद लहुलुहान अवस्था में तेजा नाग के पास आते हैं। तेजा को घायल अवस्था में देखकर नाग कहता है कि तुम्हारा तो पूरा शरीर कटा-पिटा है, मैं दंश कहां मारूं। तब वीर तेजा उसे अपनी जीभ पर काटने के लिए कहते हैं।

वीर तेजा की वचनबद्धता को देखकर नाग उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहता है कि आज के दिन (भाद्रपद शुक्ल दशमी) से पृथ्वी पर कोई भी प्राणी, जो सर्पदंश से पीड़ित होगा, उसे तुम्हारे नाम की ताँती बांधने पर जहर का कोई असर नहीं होगा। यही कारण है कि भाद्रपद शुक्ल दशमी को तेजाजी के मंदिरों में श्रृद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है और सर्पदंश से पीड़ित व्यक्ति वहां जाकर तांती खोलते हैं।