Tuesday, August 29, 2017

भारत की धार्मिक आस्‍था।

सावधान! कहीं आप अपनी राह तो नहीं भटक रहे हो?
या फिर धर्म के बदले पाप कर रहे हो?
पोस्ट को एक बार अवश्य पढे़। वेदों में कहा गया है कि धर्म भारत की आत्मा है। सभी प्रायः अपने सुखी जीवन की कामना के लिए धर्म-कर्म का मार्ग चयन करते है। लेकिन वर्तमान स्थिती में धर्म के मार्ग का चयन करना बहुत ही कठिन हो गया है। इन सब का कारण है असामाजिक तत्व व सनातन विरोधी। आज विश्वगुरु कहलाने वाले भारत की स्थिती दयनीय है। बाबा राम रहीम, रामपाल महाराज आदि धर्म के ठेकेदारों ने भारत की धार्मिक आस्था को ठेंस पंहुचायी है। इनकी काली करतूतों से भारत की छवि खराब हुई है। भारत में हुई इस शर्मशार को विदेशी मिडिया ने काफी लोकप्रिय कर भारत को अंध भक्त तथा मूर्खों की श्रेणी में खड़ा कर दिया हैं। विदेशी मिडिया ने भारतीय छवि को जिस प्रकार प्रकाशित किया है उस प्रकार से लगता है कि वास्तव में हम भक्त नहीं अंधभक्त ही है। धर्म क्या है? वास्तम में हम धर्म से अनजान है तभी तो एक बलात्कारी, हत्यारे व कलंकित व्यक्ति के लिए अपनी जान तक खतरे में डाल देते है, सरकारी सम्पति को नुकसान पंहुचाते है, आग लगाते है, जन हानि करते है क्या यहीं सिखाते है डेरों में? क्या ऐसे ही ज्ञान देने वाले है गुरू? अगर ऐसा ही है तो थू है ऐसे गुरू पर, मैनें अपनी एक फेसबुक पोस्ट के माध्यम से पहले ही कहा है कि साधु का काम जनकल्याण होता है न कि भोग-विलास करना। अपने आप को भगवान कहने वाले पाखंड़ी, बलात्‍कारी को न्यायधिक्ष के समक्ष हाथ जोड़कर रोता देखा गया। वास्तविकता क्या है इसको जानने के लिए हम कभी भी प्रयत्न नहीं करते है। हम भी भेड़चाल का अनुसरण करने लगे है। अभी भी वक्त है अपनी आंखों की काली पट्टी को हटाकर वेदों का अनुसरण कर धर्म का मार्ग चयन करों। वेदों की और लोटों। अगर आपको #कुमार_मुकेश की यह पोस्ट पसंद आये तो शेयर करना ना भूलें ताकि सभी तक यह पोस्ट पंहुच सके। सध्यन्यवाद! जय सनातन।

Friday, October 28, 2016

श्री धन्वन्तरि जयंती।

 भगवान धन्वन्तरि के प्राकट्योत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं। आज का दिन आयुर्वेद के जनक भगवान धन्वन्तरि की जयंती के रूप में मनाया जाता है। सर्वाधिक प्राचीन चिकित्सा प्रणाली के रूप में आयुर्वेद विश्व को भारत की अनमोल देन है। सभी के सुस्वास्थ्य तथा दीर्घायुष्य की कामना के साथ धन्वन्तरि जयंती की शुभकामनाएँ। आज का दिन आयुर्वेद के जनक भगवान धन्वन्तरि की जयंती के रूप में मनाया जाता है। सर्वाधिक प्राचीन चिकित्सा प्रणाली के रूप में आयुर्वेद विश्व को भारत की अनमोल देन है। सभी के सुस्वास्थ्य तथा दीर्घायुष्य की कामना के साथ धन्वन्तरि जयंती की शुभकामनाएँ।

Monday, September 05, 2016

गणेश वंदना।


वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
हे वक्रतुण्ड, महाकाय, करोड़ों सूर्यों के समान आभा वाले देव (गणेश), मेरे सभी कार्यों में विघ्नो का अभाव करो, अर्थात् वे बिना विघ्नों के संपन्न होवें।

किसी भी पूजा-अर्चना या शुभ कार्य को सम्पन्न कराने से पूर्व गणेश जी की आराधना की जाती है।
गणेशजी को वक्रतुण्ड पुकारा गया है। तुण्ड का सामान्य अर्थ मुख या चोंच होता है, किंतु यह हाथी की सूंड़ को भी व्यक्त करता है। गणेश यानी टेढ़ीमेढ़ी सूंड़ वाले। उनका पेट या तोंद फूलकर बढ़ा हुआ, अथवा भारीभरकम है, अतः वे महाकाय– स्थूल देह वाले – हैं। उनकी चमक करोड़ों सूर्यों के समान है। यह कथन अतिशयोक्ति से भरा है। प्रार्थनाकर्ता का तात्पर्य है कि वे अत्यंत तेजवान् हैं। निर्विघ्न शब्द प्रायः विशेषण के तौर पर प्रयुक्त होता है, किंतु यहां यह संज्ञा के रूप में है, जिसका अर्थ है विघ्न-बाधाओं का अभाव। तदनुसार निहितार्थ निकलता है सभी कार्यों में ‘विघ्न-बाधाओं का अभाव’ रहे ऐसी कृपा करो, अर्थात् विघ्न-बाधाएं न हों।

Thursday, August 25, 2016

कृष्ण जन्माष्टमी।

कृष्ण जन्माष्टमी।
इंद्र ने नारदजी से कहा- हे ऋषि इस कृष्ण जन्माष्टमी का पूर्ण विधान बताएं एवं इसके करने से क्या पुण्य प्राप्त होता है, इसके करने की क्या विधि है? नारदजी ने कहा- हे इंद्र! भाद्रपद मास की कृष्णजन्माष्टमी को इस व्रत को करना चाहिए। उस दिन ब्रह्मचर्य आदि नियमों का पालन करते हुए श्रीकृष्ण का स्थापन करना चाहिए। सर्वप्रथम श्रीकृष्ण की मूर्ति स्वर्ण कलश के ऊपर स्थापित कर चंदन, धूप, पुष्प, कमलपुष्प आदि से श्रीकृष्ण प्रतिमा को वस्त्र से वेष्टित कर विधिपूर्वक अर्चन करें। गुरुचि, छोटी पीतल और सौंठ को श्रीकृष्ण के आगे अलग-अलग रखें। इसके पश्चात भगवान विष्णु के दस रूपों को देवकी सहित स्थापित करें। हरि के सान्निध्य में भगवान विष्णु के दस अवतारों, गोपिका, यशोदा, वसुदेव, नंद, बलदेव, देवकी, गायों, वत्स, कालिया, यमुना नदी, गोपगण और गोपपुत्रों का पूजन करें। इसके पश्चात आठवें वर्ष की समाप्ति पर इस महत्वपूर्ण व्रत का उद्यापन कर्म भी करें। यथाशक्ति विधान द्वारा श्रीकृष्ण की स्वर्ण प्रतिमा बनाएँ। इसके पश्चात 'मत्स्य कूर्म' इस मंत्र द्वारा अर्चनादि करें। आचार्य ब्रह्मा तथा आठ ऋत्विजों का वैदिक रीति से वरण करें। प्रतिदिन ब्राह्मण को दक्षिणा और भोजन देकर प्रसन्न करें।

पूर्ण विधि।
उपवास की पूर्व रात्रि को हल्का भोजन करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें। उपवास के दिन प्रातःकाल स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त हो जाएँ। पश्चात सूर्य, सोम, यम, काल, संधि, भूत, पवन, दिक्‌पति, भूमि, आकाश, खेचर, अमर और ब्रह्मादि को नमस्कार कर पूर्व या उत्तर मुख बैठें। इसके बाद जल, फल, कुश और गंध लेकर संकल्प करें-
ममखिलपापप्रशमनपूर्वक सर्वाभीष्ट सिद्धये
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतमहं करिष्ये॥
अब मध्याह्न के समय काले तिलों के जल से स्नान कर देवकीजी के लिए 'सूतिकागृह' नियत करें। तत्पश्चात भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। मूर्ति में बालक श्रीकृष्ण को स्तनपान कराती हुई देवकी हों और लक्ष्मीजी उनके चरण स्पर्श किए हों अथवा ऐसे भाव हो। इसके बाद विधि-विधान से पूजन करें। पूजन में देवकी, वसुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा और लक्ष्मी इन सबका नाम क्रमशः निर्दिष्ट करना चाहिए।
फिर निम्न मंत्र से पुष्पांजलि अर्पण करें- 'प्रणमे देव जननी त्वया जातस्तु वामनः।
वसुदेवात तथा कृष्णो नमस्तुभ्यं नमो नमः।
सुपुत्रार्घ्यं प्रदत्तं में गृहाणेमं नमोऽस्तु ते।'
अंत में प्रसाद वितरण कर भजन-कीर्तन करते हुए रतजगा करें।

उद्देश्य।
जो व्यक्ति जन्माष्टमी के व्रत को करता है, वह ऐश्वर्य और मुक्ति को प्राप्त करता है। आयु, कीर्ति, यश, लाभ, पुत्र व पौत्र को प्राप्त कर इसी जन्म में सभी प्रकार के सुखों को भोग कर अंत में मोक्ष को प्राप्त करता है। जो मनुष्य भक्तिभाव से श्रीकृष्ण की कथा को सुनते हैं, उनके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। वे उत्तम गति को प्राप्त करते हैं।

Friday, August 05, 2016

हरियाली तीज।

हरियाली तीज।

हरतालिका तीज व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हस्त नक्षत्र के दिन होता है। इस दिन कुमारी और सौभाग्यवती स्त्रियाँ गौरी-शंकर की पूजा करती हैं। विशेषकर उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और बिहार में मनाया जाने वाला यह त्योहार करवाचौथ से भी कठिन माना जाता है क्योंकि जहां करवाचौथ में चांद देखने के बाद व्रत तोड़ दिया जाता है वहीं इस व्रत में पूरे दिन निर्जल व्रत किया जाता है और अगले दिन पूजन के पश्चात ही व्रत तोड़ा जाता है। इस व्रत से जुड़ी एक मान्यता यह है कि इस व्रत को करने वाली स्त्रियां पार्वती जी के समान ही सुखपूर्वक पतिरमण करके शिवलोक को जाती हैं।

सौभाग्यवती स्त्रियां अपने सुहाग को अखण्ड बनाए रखने और अविवाहित युवतियां मन मुताबिक वर पाने के लिए हरितालिका तीज का व्रत करती हैं। सर्वप्रथम इस व्रत को माता पार्वती ने भगवान शिव शंकर के लिए रखा था। इस दिन विशेष रूप से गौरी−शंकर का ही पूजन किया जाता है। इस दिन व्रत करने वाली स्त्रियां सूर्योदय से पूर्व ही उठ जाती हैं और नहा धोकर पूरा श्रृंगार करती हैं। पूजन के लिए केले के पत्तों से मंडप बनाकर गौरी−शंकर की प्रतिमा स्थापित की जाती है। इसके साथ ही भगवान गणेश की स्थापना कर चंदन, अक्षत, धूप दीप, फल फूल आदि से षोडशोपचार पूजन किया जाता है और पार्वती जी को सुहाग का सारा सामान चढ़ाया जाता है। रात में भजन, कीर्तन करते हुए जागरण कर तीन बार आरती की जाती है और शिव पार्वती विवाह की कथा सुनी जाती है।

Wednesday, July 20, 2016

शिव की उपासना।

शिव की उपासना।

सावन मास में शिव भक्ति का पुराणों में भी उल्लेख मिलता है। पौराणिक कथाओं में वर्णन आता है कि इसी मास में समुद्र मंथन किया गया था। समुद्र मथने के बाद जो विष निकला उसे भगवान शंकर ने कंठ में समाहित कर सृष्टि की रक्षा की लेकिन विषपान से महादेव का कंठ नीलवर्ण हो गया। इसी से उनका नाम नीलकंठ महादेव पड़ा। विष के प्रभाव को कम करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने उन्हें जल अर्पित किया। इसलिए शिवलिंग पर जल चढ़ाने का खास महत्व है। यही वजह है कि श्रावण मास में भोले को जल चढ़ाने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। शिवपुराण में उल्लेख है कि भगवान शिव स्वयं ही जल हैं। इसलिए जल से उनकी अभिषेक के रुप में अराधना का उत्तमोत्तम फल है जिसमें कोई संशय नहीं है।

संजीवनं समस्तस्य जगतः सलिलात्मकम्‌।
भव इत्युच्यते रूपं भवस्य परमात्मनः ॥
अर्थात्‌ जो जल समस्त जगत्‌ के प्राणियों में जीवन का संचार करता है वह जल स्वयं उस परमात्मा शिव का रूप है। इसीलिए जल का अपव्यय नहीं वरन्‌ उसका महत्व समझकर उसकी पूजा करना चाहिए। पुराणों में यह भी कहा गया है कि सावन के महीने में सोमवार के दिन शिवजी को एक बिल्व पत्र चढ़ाने से तीन जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है। इसलिए इन दिनों शिव की उपासना का बहुत महत्व है।